ज़िंदगी लंबी लगने लगी है पर वक़्त बहोत कम है,
दिल-ए-आरज़ू में अब भी कितने खम है।
होता अगर तो पूरे करता वह हर एक ख्वाब,
अफ़सोस अपनी किस्मत भी इन आँखों की तरह नम है |
4 October 2016
ज़िंदगी लंबी लगने लगी है पर वक़्त बहोत कम है,
दिल-ए-आरज़ू में अब भी कितने खम है।
होता अगर तो पूरे करता वह हर एक ख्वाब,
अफ़सोस अपनी किस्मत भी इन आँखों की तरह नम है |